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आलीशा की आत्‍मा

 राघव कैमरे को अपनी गोद में रखे बैठा था। उसकी उंगलियाँ लेंस को एडजस्ट कर रही थीं। पास ही बैठी थी आलीशा — नीले रंग के नेट के सूट में, जो शरीर को पूरी तरह छिपाता तो था, मगर हर मोड़, हर कर्व को छुपा नहीं पाता था। "आपको फोटोग्राफी में क्या सबसे ज़्यादा पसंद है?" राघव ने पूछा। "देखना..." आलीशा ने धीमी मुस्कान के साथ कहा। "बस एक नज़र में समझ जाना कि कौन-सा फ्रेम किसे पकड़ रहा है... और कौन-सा फ्रेम मुझे..." राघव ने कैमरे को उठाया और बिना बोले उसकी तरफ इशारा किया — "बैठिए वैसे... हाँ... थोड़़ा एक कंधा नीचे करें। एक पैर मोड़ लीजिए।" आलीशा ने थोड़ी हिचक के साथ वही किया। "इस सूट में आप जितना छुपना चाहती हैं, उतना ही ज़्यादा दिखाई दे रही हैं," राघव ने कैमरे से झाँकते हुए कहा। "मतलब?" "मतलब… ये नीला जाल जितना ढँकता है, उससे ज़्यादा उभारता है। जैसे कोई कह रहा हो — देखो, मगर पूरा मत देखो।" क्लिक। फिर एक और क्लिक। राघव ने कैमरे का प्रीव्यू मोड खोला और उसकी तरफ झुककर स्क्रीन दिखाई। "ये देखिए। ये आपके कंधे के नीचे की हल्की सी परछ...
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नृत्‍य सीखाने में लिया

  शाम होने को आई, ट्रेन दिल्‍ली की सीमा पार कर आगरा पहुँच चुकी थी, तभी दरवाजे पर हरकत हुई और दो जोड़ो ने प्रवेश किया। पसीने से लथपथ दोनो को एसी की हवा ने ठंडी राहत दिया। दोनो के बैठते ही नास्‍ता आ गया, नास्‍ता करते करते दोनो रिलेक्‍स मोड में आ चुके थे। तभी टीटी आया और टिकट चेक करने लगा, टीटी से ही पता चला कि नये आये जोड़े का नाम अमित और आलीशा है दोनेा बंगलौर तक जायेगें। ट्रेन में कभी अमित और आलीशा की तो कभी श्रुति और राघव की आवाज गूज रही थी। ट्रेन धीरे धीरे झासी की ओर बढ रही थी। हल्‍का अंधेरा होने को आया। अमित ने अपने बैग से एक विस्‍की की बोलत निकाला और राघव से बोला यदि आपको एतराज न हो तो मैं अपनी शाम को रंगीन कर लूँ, बात वह राघव से पूछ रहा था मगर निगाहे उसकी श्रुति पर थी। क्‍यों इसके बिना शाम नहीं होती क्‍या श्रुति ने बीच में ही रोक पर राघव की तरफ देखते हुए पूछा। दोनो हंस पड़े, अमित ने हसते हुए राघव से पूछा आप भी लेते हैं, राघव ने श्रुति के तरफ देखते हुए कहा कभी कभी, उसके चेहरे पर मुस्‍कुराहट थी। तो आईये कभी कभी आज तभी तभी हो जाये, अमित ने अपने बैग से दो गिलास निकले और पैग ब...

गेस्‍ट हाउस की रात

  पहाड़ों की ढलान पर बना वह छोटा सा दो कमरों का सरकारी गेस्ट हाउस बाहर की मूसलाधार बारिश और भूस्खलन के भयानक शोर से लगातार थरथरा रहा था। बाहर रास्ता पूरी तरह बंद हो चुका था , पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा ढह जाने के कारण बिजली के सारे खंभे उखड़ चुके थे। कूपेनुमा कमरे में सिर्फ़ एक पुरानी मोमबत्ती की मद्धम , पीली और काँपती हुई लौ जल रही थी , जिसकी परछाइयाँ सीलन भरी दीवारों पर नाच रही थीं। ऑफ़िस में रोहन और नेहा का रिश्ता हमेशा बेहद पेशेवर रहा था — रोहन एक सख्त सीनियर प्रोजेक्ट लीड था और नेहा अपनी शर्तों पर काम करने वाली सीनियर एनालिस्ट। लेकिन इस अचानक आई प्राकृतिक आपदा , कड़ाके की ठंड और बाहर मंडराती मौत के इस सन्नाटे ने दोनों के बीच के सारे औपचारिक पर्दे एक झटके में फाड़ दिए थे। कमरे में ठंड इतनी भयानक थी कि दोनों एक ही भारी कंबल के नीचे सिमटे हुए थे। मोमबत्ती की रोशनी में नेहा की पसीने और ठंड से भीगी त्वचा चमक रही थी। उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी। " रोहन... बाहर का रास्ता शायद कल तक भी न खुले ," नेहा ने अपनी काँपती हुई आवाज़ में कहा। उसकी गर्म साँसें रोहन की ठुड्डी ...